छेर -छेरता का पर्व बड़े धूम धाम के साथ मनाया गया क्या है इस पर्व की विशेषता

NEWS DESK R : 21-01-19 03:28:01



भैयाथान:-  (संदीप पाल) सूरजपुर जिला आदिवासियों से परिपूर्ण है।और इस जिले में आज छेर छेरा पर्व बड़े धूम धाम से मनाया गया और नए फसल को लेकर,,,, किसानों के बीच मनाए जाने वाले इस त्योहार का विशेष महत्व है। सोमवार को पूरे जिले में छेरछेरा का पर्व धूमधाम से मनाया गया। पूरे क्षेत्र में छेरछेरा कोठी के धान ल हेरते हे रा की गूंज सुनाई दी। बच्चे त्योहार की खुशियां मनाने घरों में पहुंचे और नई फसल होने की बधाई देते हुए अपने लिए बख्शीश की मांग की। पारंपरिक त्योहार छेरछेरा का पर्व धान फसल की कटाई व मिंजाई पूरा होने की खुशी में मनाया जाता है।

छेरछेरा का उल्लास सबसे अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिला।  सुबह से ही बच्चों की टोली छेरछेरा मांगने में जुटी हुई है। हाथों में थैली टांगे ये बच्चे लोगों के घरों पर जाकर दिन भर छेरछेरा मांगते रहे। शहर में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह रहा  खासकर बच्चों में इस त्योहार को लेकर ज्यादा उत्सुकता रही। ,,,

ग्रामीण क्षेत्रों में लोक पर्वों में छेरछेरा का अपना अलग महत्व है।इस पर्व को लेकर बच्चों में  खास उत्साह देखने को मिला। बच्चे टोलियां बनाकर घर-घर पहुंचे और छेरता गीत गाकर चावल, दाल व अन्य खाद्य सामग्री मांगी। इसके बाद सभी सामग्रियों का भोजन तैयार कर पिकनिक का आनंद लिया। वहीं ग्रामीण भी पर्व की खुशी में डूबे रहे।

""नई फसल को खेतों से खलिहानों में आने की खुशी और अच्छी फसल को लेकर इस लोक पर्व छेरछेरा मनाया जाता हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन से ग्रामीण अंचलों में शुभ कार्यों की भी शुरुआत हो जाती है। छेरछेरा, कोठी के धान ल हेरते हेरा जैसे पारंपरिक बोल के साथ छेरछेरा के दिन बच्चों की टोली घर-घर जाकर अन्न मांगती हैं।
किसान भी खुले हाथों से बच्चों को अन्न का दान करते हैं। इस दिन लोक गीतों की भी बहार रहती है। यह पर्व किसानों की खुशी का पर्व होता है। यह पर्व छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति ग्रामीण जन-जीवन संपदा और समानता को प्रकट करता है।  ग्रामीण अंचलों में बच्चो व बुजुर्गों ने सुबह होते ही हर घरों में अन मांगना शुरू कर दी जाती है।,,,

छेरछेरा पर्व किसानों के लिए अत्यंत खुशी का पर्व होता है।जो किसानों के लिए सुख समृद्धि का द्योतक है। इस दिन दान करने का अपना अलग महत्व है। लोग अपने घरों पर आने वालों को दान देकर खुशियां बांटते हैं। यह पर्व आपसी प्रेम व सौहाद्र्र को बढ़ाने वाला है। ,,
पक्षियों के लिए टांगते हैं धान की बालीया ।
वही बुजुर्ग ग्रामीणों ने बताया कि छेरछेरा में अन्न दान देने की परंपरा है, जिसे पूरा करने के साथ एक यह भी परंपरा है कि पक्षियों के लिए भी अन्नदान किया जाए। पक्षियों के लिए धान दान किया जाता है। पक्षियों के लिए लोग धान घरों के बाहर दरवाजे सहित अन्य जगहों पर बालियों के रूप में टांगते हैं, इसे पक्षी खाते हैं। यह घरों के पूजा स्थल में भी टांगा जाता है, जिसे काफी शुभ माना जाता है।,,
पारंपरिक व्यंजनों का है महत्व
प्रत्येक पर्व में बनाए जाने वाले व्यंजनों का अपना अलग महत्व होता है। छेरछेरा पर्व में नए चावल से पारंपरिक व्यंजन बनाने की भी परंपरा है। छेरछेरा के दिन चावल के बने पकवानों से पर्व की खुशियां भी दोगुनी हो जाती हैं। घर में आने वाले मेहमानों का स्वागत भी पारंपरिक व्यजनों से किया जाएगा।
सुबह बच्चे-बूढे़ जवान छेर छेरता मांगने घर घर घूमते हैं।
बड़े बुजुर्गों ने बताया कि इस त्यौहार के बारे में मान्यता है कि एक बार गांव में महाअकाल पड़ने पर गांव की पूरी फसल चौपट हो गई वहीं पशु-पक्षी,इंसान भूख से मरने लगे। इससे चिंतित गांव वालों ने ग्राम देवता पूरे भक्तिभाव से अर्चना कर महादेव को आमंत्रित किया। गांव वालों की पुकार पर महादेव ने माता पार्वती के साथ गांव वालों को दर्शन दिए। आदिदेव के दर्शनों से गांव-वालों ने पूरी तन्मयता से उनकी सेवा-सुश्रुषा की। ग्रामीणों ने महादेव और पार्वती के पांव पखारे और धूप बत्ती से उनकी पूजा की। इससे महादेव प्रसन्न हुए और ग्रामीणों से वरदान मांगने को कहा। इस पर ग्र्रामीणों ने महादेव से अकाल से गांव की रक्षा का वरदान मांगा। अभावों के बावजूद गांव वालों की भक्ति भावना देख कर महादेव प्रसन्न हुए और उन्होंने गांव की रक्षा का वरदान दिया। बदले में ग्रामीणों ने दक्षिणास्वरुप महादेव को फसल का एक भाग देने का वचन दिया। महादेव ने इसके लिए फसल तैयार होने के बाद छेरछेरता के दिन आने की बात कही। माना जाता है कि तब से महादेव गांव वालों की रक्षा करने के एवज में उनके द्वारा दक्षिणास्वरुप दिए जाने वाले दान को लेने के लिए हर साल छेर-छेरता के दिन गांव-गांव घूमते हैं। यह परंपरा आज भी जीवित है और आज भी लोग छेर छेरता मांगने वालों को खाली हाथ नही लौटाते है। ऐसी मान्यता है कि छेर-छेरता मांगने वालों के वेश में स्वयं महादेव उनके द्वारा आए हैं और उन्हें खाली हाथ लौटाने वाले के घर में बरकत नहीं होती है। छेर-छेरता मांगने वाले गांव में लोगों के घरों के सामने टोकरी लाकर रख देते हैं। उन्होंने बताया कि यह ऐसी अनूठी परंपरा है जिसमें दाने के लिए भी लोगों में उत्साह देखते ही बनता हैं और थोड़ी ही देर में टोकरी दान के अन्न से भर जाती है।
सुआ नृत्य की परंपरा
छेर-छेरता के पर्व पर सुआ नृत्य,डंडा नृत्य तथा लोकडी नृत्य की भी परंपरा है।सुआ नृत्य में सुआ के रूप में पार्वती को गांव गांव घुमाया जाता है। गांव के लोग बड़ी लगन से सुआ नृत्य का लुत्फ उठाते है और दान दक्षिणा में धान,चावल तथा पैसा दान करते हैं। डण्डा नृत्य में एक विदूषक बनकर लोगों को हंसाने का काम करता है। माना जाता है कि वह भगवान शिव के सेनापति हैं और उन्हें देखकर भी ग्राम वासी प्रसन्न रहते हैं। लोकडी नृत्य में भी महादेव का बालरूप झलकता है। छेर-छेरता के दिन इन सभी नृत्य आयोजनों का समापन होता है और इस पर्व के बाद ही आदिवासियों में मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। छेर-छेरता के दिन शाम को डोम-कच एवं करमा नृत्य का भी आयोजन किया जाता है।



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