जाते हुए सरहद के जांबाजों ने कहा- हम सड़क बनाएंगे, तभी तो हमारी फौज तोप लेकर चीन सीमा पर दहाड़ेगी

hindustan path : 13-06-20 08:57:06

दुमका/रांची-  बाॅर्डर पर सेना हो या श्रमिक। सभी सरहद की कहानी के जांबाज हैं। दो पैसा कमाने की तमन्ना तो हर किसी की होती है। परंतु दो पैसे की कमाई में देश सेवा का मर्म हो तो फक्र होता है ऐसे देशवासी पर। संताल परगना की माटी में जन्मे लखन मांझी की सोच को सलाम है। लेह-लदाख जाने के लिए दुमका से खुलने वाली स्पेशल ट्रेन में सवार होने से पहले उसने कहा कि हम सड़क बनाएंगे, तभी तो हमारी फौज तोप लेकर चीन की सीमा पर दहाड़ेगी। इस बात की फिक्र नहीं कि सीमा पर तनाव है। लब यह कहते कहते फड़फड़ा उठे कि मरना होगा तो घर में मरे या बाॅर्डर पर क्या फर्क। देश की सेवा पहले है। सरकार ने इस बार विशेष इंतजाम किया है। देखते हैं क्या मिलेगा।


लखन दस साल से सरहद पर सड़क बनाने जा रहा है। उसमें गजब का उत्साह व जज्बा था। जब वह घर से चला था तो घरवाले ने कहा कि एक बार सोच लीजिए अभी भारत-चीन में तनातनी चल रहा है। बहुत तनाव का समय है। गांव के बड़े बुजुर्ग भी कह रहे थे, जाना है तो एक बार ठंडे मन से सोच लेना चाहिए। लखन इस बात की तनिक भी परवाह नहीं किया। वह सीमा पर सड़क बनाने का काम सालों से कर रहा है। यह कहते हुए हाथ को हवा में लहरा दिया कि जब ठीक से मूंछ नहीं आयी थी तभी से वह कश्मीर, कारगिल, कदमा जाता रहा है। वाकई इस बहादुर में देशभक्ति का रक्त प्रवाह हो रहा है।

लखन के मन में केवल इस बात की टिस है कि सरकार उसकी रोजी रोटी का स्थायी इंतजाम कर दे। अभी साल में चार-पांच महीना ही काम मिलता है। वह मजदूर ही बना रहना चाहता है लेकिन सरकार से गुजारिश है कि वह स्थायी मजदूर बनाकर सालोंभर का पगार दे। इस बार राज्य सरकार बहुत मदद कर रही है। पैसा भी ज्यादा है और बीमा भी कराया गया है। अब तक तो इस सबका ठौर ठिकाना भी नहीं था। अब कम से कम हमारे जैसे मजदूरों का रिकार्ड तो बन गया।

जामा के परमा के रहने वाले हैं लालजी राउत। इनकी सोच भी देशप्रेम से ओतप्रोत है। पैसा कमाने तो जाना होगा साहब। फौजी भी तो जाते है। दोनों सीमा पर काम करते हैं। हम सरहद पर सहूलियत का रास्ता बनाते हैं। हमारी सैनिक उस पर चलकर मां भारती की रक्षा करते हैं। कहा कि लॉकडाउन के कारण घर में बैठे हुए थे। अब काम करने का बुलावा आया तो जाने को तैयार हैं। बच्चों के लिए दो पैसा तो कमाना होगा ना साहब...! तो कभी खुशी कभी गम वाली बात है। काम मिलने की खुशी है तो अब तक घर में बैठे रहने का गम था। लॉकडाउन के दरमियान संताल परगना के श्रमिकों ने इतिहास रचा है। सरहद पर विकास की यात्रा को आगे बढ़ाने में हौसले के साथ सबसे पहला कदम बढ़ाया। आहिस्ता आहिस्ता ट्रेन ने प्लेटफार्म से सरकने लगी। धीरे धीरे वह ओझल होती चली गयी....।




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