आजादी के बाद लगातार बदलता रहा भूगोल और सियासी कैरेक्टर,कितना जानते हैं आप बंगाल को?

Khyati Paikra : 11-01-21 01:39:01

विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहे पश्चिम बंगाल की चर्चा आज पूरे देश में हो रही है. कभी आजादी के आंदोलन में अग्रणी रहे बंगाल की एक अलग सांस्कृतिक पहचान है. स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय, बंकिम चंद्र चटर्जी, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, रविंद्रनाथ टैगोर के समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला बंगाल कभी भारत में पुनर्जागरण के केंद्र के रूप में जाना जाता था. आजादी के समय बांग्लादेश विभाजन ने बंगाल के भूगोल को काफी हद तक बदला तो उसके बाद बांग्लादेश से लगातार पलायन भी बंगाल की तस्वीर का एक अभिन्न हिस्सा बना रहा.

इतना ही नहीं 1970 के दशक में पनपे नक्सलवादी आंदोलन का केंद्र भी लंबे समय तक बंगाल रहा. राजनीतिक विचारधारा में लगातार प्रयोग और बदलावों के बीच आर्थिक पिछड़ापन भी बंगाल की हमेशा नियति बनी रही. सियासी हिंसा, आर्थिक पिछड़ेपन, बड़ी आबादी, पलायन के बढ़ते बोझ जैसे इतने सारे सवालों से जूझ रहा बंगाल आज एक बार फिर चुनावी परीक्षा के मोड़ पर खड़ा है. लेकिन बंगाल को देश का आर्थिक इंजन नहीं तो सांस्कृतिक इंजन तो कहा ही जा सकता है.

करीब 9 करोड़ की आबादी वाला पश्चिम बंगाल देश के सबसे ज्यादा घनी आबादी वाले राज्यों में से एक है तो क्षेत्रफल के हिसाब से देश में इसका स्थान 14वां है. बांग्लादेश, नेपाल और भूटान तीन देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बंगाल से लगती हैं. तो वहीं भारतीय राज्यों में बिहार, झारखंड, सिक्किम, असम और ओडिशा की सीमाएं लगती हैं. राज्य में गंगा के बेसिन के इलाके हैं तो दार्जीलिंग जैसे पहाड़ी इलाके और सुंदरवन के डेल्टा इलाके भी हैं. राज्य में जल संसाधन से समृद्ध नदियां हैं तो समंदर के किनारों और बंदरगाहों के करीब व्यापार के बड़े केंद्र भी हैं.

आर्थिक पहलू को देखें तो 12.54 लाख करोड़ रुपये के राज्य सकल घरेलू उत्पाद के साथ आज देश के राज्यों की इकोनॉमी में बंगाल का स्थान छठा है. बंगाल में बेरोजगारी दर 6.5 प्रतिशत है. राज्य के खजाने पर 4 लाख करोड़ का कर्ज है. बंगाल चावल, आलू और जूट की खेती के लिए जाना जाता है. लेकिन राज्य की अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर है.

कभी एक जमाने में बंगाल के कई इलाके औद्योगिक सेंटर के रूप में जाने जाते थे लेकिन पहले देश विभाजन के साथ बंगाल के विभाजन और आजादी के बाद नक्सलवाद की समस्या और ट्रेड यूनियनों की पॉलिटिक्स ने राज्य में औद्योगिक विकास को काफी प्रभावित किया. इसके बाद सिंगुर और नंदीग्राम के प्रोटेस्ट ने नए उद्योगों और निवेश के कदमों को भी झटका दिया.  राज्य की आबादी को धार्मिक आधार पर देखें तो 70 फीसदी हिंदू आबादी है जबकि 27 फीसदी मुस्लिम आबादी. राज्य में साक्षरता दर 77.08 फीसदी है जो कि राष्ट्रीय औसत 74.04 % से ज्यादा ही है. माछ-भात, रसोगुल्ला बंगाल के मशहूर डिश हैं जिसे पूरे देश में पसंद किया जाता है.

आजादी के बाद कैसे बदलता रहा भूगोल?
साल 1911 तक दिल्ली की बजाय कोलकाता ही भारत की राजधानी थी. फिर अंग्रेजी शासन ने दिल्ली को सियासी राजधानी बनाने का फैसला किया. आजादी के पहले लगातार विभाजनों से बंगाल का भूगोल बदलता रहा. 1905 में बंगाल के हिंदू और मुस्लिम आधार पर विभाजन के बाद अंग्रेजी शासन के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ. इसके बाद फिर 1912 में बिहार और ओडिशा प्रोविंस को बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग कर दिया गया.

1947 में देश विभाजन के समय एक बार फिर बंगाल का विभाजन हुआ. पूर्वी पाकिस्तान अलग हुआ जो कि 1971 में बांग्लादेश के रूप में पाकिस्तान से अलग नया देश बना. एक झटके में कोलकाता की जूट फैक्ट्रियां बंद हो गईं क्योंकि कपास की खेती के इलाके बांग्लादेश में चले गए. आजादी के बाद भी बंगाल का भूगोल कई बार बदला. 1950 में कूच बिहार प्रिंसली स्टेट का बंगाल में विलय हुआ. पूर्व में फ्रांसीसी उपनिवेश रहे चंदननगर के इलाके को भी 1955 में बंगाल में मिला दिया गया. 1956 के राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर भी किशनगंज और पुरुलिया के कुछ हिस्सों को बिहार से बंगाल में मिलाया गया. वर्तमान में बंगाल का कुल क्षेत्रफल 88,752 वर्ग किलोमीटर है.

आज के पश्चिम बंगाल में चार मुख्य सियासी शक्तियां हैं- तृणमूल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां. राज्य में विधानसभा की 295 सीटें हैं जिनमें से एक सदस्य मनोनीत होता है और 294 सीटों पर चुनाव होता है. जिनमें से 210 सीटें जनरल कोटा की हैं. एससी वर्ग के लिए 68 सीटें जबकि 16 सीटें एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं. राज्य में लोकसभा की 42 सीटें हैं जबकि राज्यसभा में राज्य के 16 सदस्यों का प्रतिनिधित्व है.

सियासी विचारधारा में प्रयोगों का इतिहास
बंगाल को सियासत में लगातार वैचारिक प्रयोगों के लिए भी जाना जाता है. आजादी के बाद करीब दो दशकों तक कांग्रेस राज्य की सत्ता पर काबिज रही. 1960 के दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन के उभार ने कांग्रेस के इस किले में सेंध लगानी शुरू की. 1977 के चुनाव में राज्य में सियासी पासा पलट गया. सीपीएम की अगुवाई में लेफ्ट फ्रंट ने 294 सीटों में से 231 जीतकर सत्ता पर कब्जा कर लिया और ज्योति बसु के हाथ में राज्य की कमान आई. 1996 के चुनाव तक ज्योति बसु का जादू बरकरार रहा. इसके बाद 2001 और 2006 के चुनाव में भी लेफ्ट के बुद्धदेब भट्टाचार्य की अगुवाई में सरकार बनी.

लेकिन 2011 के चुनाव में वामपंथी विचारधारा से बंगाल का मोहभंग हुआ और ममता बनर्जी का राज्य की सियासत में उभार हुआ. तबसे पिछले एक दशक में ममता के सियासी तिलिस्म को कोई तोड़ नहीं पाया है. हालांकि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने अपने दमदार प्रदर्शन से राज्य में एक और वैचारिक करवट की पटकथा लिखने की उम्मीद जगाई है. इसीलिए पूरे देश की निगाह आज बंगाल पर है कि नए साल में क्या बंगाल की सियासत नई करवट लेगी या ममता बनर्जी का सियासी किला सुरक्षित रहेगा?




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